Monday, November 16, 2020

सेक्युलरिस्टों ने मुसलमानों को कैसे भाजपा का व्यक्तिगत दुश्मन बना दिया- -


1947 में अनथक प्रयास,मज़हबी कार्ड के बावजूद  मुस्लिम लीगी जिन्ना के साथ मुसलमान नहीं गया. कांग्रेसी मौलाना आज़ाद की आवाज़ सुनी और भारत में रह गये.अपने वतन की मिट्टी की ख़ुश्बू ने उन्हें जाने नहीं दिया.दूसरी वजह थी, मौलाना आज़ाद जैसी शख़्सियत उनके पास थी. मौलाना को मुसलमान मुहाफ़िज़ मान रहे थे.आज़ाद शिक्षा मंत्री बनाये गये थे,सरदार पटेल तक उनकी इज़्ज़त करते थे.आज़ादी मिली तो मुसलमानों ने सोचा उनके आंगन में भी ख़ुशहाली के फुल खिलेंगे.सो,पाकिस्तान जाने का क्या फ़ायदा ? ज़ाहिर सी बात है,जंग ए आज़ादी में उनके भी लहू बहे थे और यह सोचना वाजिब था.

उस वक़्त जनसंघ नहीं था, भाजपा भी नहीं.जनसंघ की स्थापना 1951 में हुई. प्रथम आम चुनाव से ठीक एक साल पहले.आरएसएस पांव पसारने के फ़िराक़ में था. गांधी की हत्या और भारत की साझी सांस्कृति, सेक्युलर विरासत को चोट पहुंचाने की मंशा भांप  सरदार पटेल ने उस पर 1948 में प्रतिबंध लगा दिया .इस बीच 1950 में पटेल का निधन हो गया. बाद में नेहरु ने प्रतिबंध हटा लिया और यहीं से सांप्रदायिक कार्ड का आग़ाज़ हुआ .मुसलमानों को डराने का.वोटबैंक बनाने का.

मुसलमानों पर देश के बांटवारे का सुनियोजित ढंग से आरोप मढ़ दिया गया था.माहौल प्रतिकूल थे. मुसलमान वाक़ई डरे-सहमे थे.यह जाल भी कांग्रेस ने बाक़ायदा बिछाया था. 1952 के चुनाव में जनसंघ से डराने की शुरुआत हुई. आज़ादी मिली तो कांग्रेस और बाद के दिनों में कथित सेक्युलर पार्टियों ने सांप्रदायिकता का जिन्न बनाया और बोतल में बंद कर दिया. मुसलमानों से कहा यदि हमारी पार्टी को वोट नहीं किया तो बोतल का ढक्कन खोल देंगे और यह जिन्न तुमको निगल जायेगा. मुसलमान बुरी तरह डर गये.उसके माथे पर कथित रुप से भारत विभाजन का कलंक पहले से था.बेचारा मुसलमान करता तो क्या ? अपना एजेंडा सेट करने की बजाय जनसंघ हराओ में लग गया. मौलाना आज़ाद पर मुसलमानों ने भरोसा किया मगर उनसे राजनीतिक चूक यह हो गयी कि क़यादत की जगह मौलाना ने विज़ारत ले ली. जनसंघ हराओ का नारा देकर बड़ी चालाकी से कांग्रेस ने मुसलमानों को राजनैतिक लड़ाई की जगह सांप्रदायिक मोड में ढाल दिया. हालांकि, उस वक़्त सांप्रदायिकता उफान पर नहीं थी. आज़ादी मिलने के बाद हर कोई अपना राजनीतिक उदय में जुटा था,आज़ादी की लड़ाई सब मिल कर लड़े थे,सत्ता में हिस्सेदारी का सवाल सबके लिए अहम था. प्रतिबंध से आरएसएस की कमर टूट चुकी थी. मगर मात्र अठारह महीने में ही प्रतिबंध हटा कर उसे फलने-फुलने का मौक़ा दिया गया. मुसलमानों को डराने के लिए कोई तो मोहरा चाहिये था कांग्रेस को.जनसंघ हराओ से जो मुद्दा सेट हुआ वह भाजपा हराओ के रास्ते आज मोदी हराओ पर आ गया है. जाने-अंजाने मुसलमान मोदी और भाजपा के दुश्मन बन बैठे,बल्कि यूं कहें कि कथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने दुश्मन बना दिया.

भाजपा से मुसलमानों की व्यक्तिगत लड़ाई तो है नहीं ? देश में एक विचारधारा की लड़ाई चल रही है. देश गोडसे का रहेगा या गांधी का ? ये सिर्फ मुसलमानों की लड़ाई नहीं है, उन संपूर्ण देशवासियों का भी है, जो अमन, ख़ुशहाली, उन्नति के वाहक हैं ? देश के संविधान, सेक्युलरिज़म की रक्षा सिर्फ मुसलमानों के लिए ज़रूरी है या फिर सभी समुदाय की जरूरत है ? सांप्रदायिकता के खिलाफ़ लड़ाई सिर्फ मुसलमान लड़े या उन दलों को भी उतनी मज़बूती से लड़ना चाहिये ,जो सत्ता का तमन्ना पालते हैं. मुसलमान तो सत्ता की लड़ाई में कहीं है ही नहीं. न उसे मुख्यमंत्री बनना है,न प्रधानमंत्री.डिप्टी भी नहीं बनना. मगर भाजपा से दो-दो हाथ कौन कर रहा मुसलमान, मानो गोतिया की लड़ाई है. कथित सेक्युलर पार्टियों ने सांप्रदायिक गोलबंदी की ख़ातिर भाजपा से बुरी तरह लड़वा दिया और भाजपा ने मुसलमानों को अपना दुश्मन नंबर वन मान लिया. जिसका परिणाम उत्तरप्रदेश में दिख रहा है. तंग वो तबाह करके रख दिया गया है मुसलमानों को और उनके पीठ पर न समाजवादी खड़ा है और न कांग्रेसी.मुसलमान इन बारीकियों को समझ नहीं पा रहे. भाजपा के ख़िलाफ़ लड़ाई में मुसलमान फ़्रंट पर है और सांप्रदायिकता के विरुद्ध लड़ाई का ढोंग रचने वाले दल दड़बे में बंद.यह कैसी लड़ाई है कि लड़ते-लड़ते नरेंद्र मोदी को केंद्र की सत्ता में स्थापित कर दिया ?

भाजपा सांप्रदायिक विचारधारा वाली एक मात्र पार्टी  है,किसी भी पार्टी के लिए अपने विचारधारा का विस्तार वास्तविक सोच होना ही चाहिए, मगर एक सौ से अधिक तो सेक्युलर सोच वाली पार्टियां हैं देश में .उसे अपने उसूलों, धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर ईमानदारी से चलने में  किसने रोक लगा रखी है ? क्यों सत्तर-बहत्तर साल बाद भी सेक्युलरिज़म भारत की आत्मा नहीं बन सकी ? क्यों लोगों ने इसे आत्मसात नहीं किया ? इस पर कोई गहराई से बात करना नहीं चाहता. क्यों लाल झंडा सुस्त पड़ गया ? क्यों ओवैसी का उदय हुआ ?मुकम्मल बहस की ज़रूरत है इस पर .2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद सांप्रदायिक उन्माद बेशक चरम पर है. प्रधानमंत्री के चेताने के बाद भी उन्मादियों पर कोई असर नहीं है. दोबारा मोदी जब सत्तासीन हुए तो पूरा विपक्ष हताशा में चला गया.सबको लगा अब सब कुछ ख़त्म हो गया.लगे सटे धारा 370 को झटके में निरस्त कर दिया तो विपक्ष को सांप ही सूंघ गया. सभी डर सताने लगा कुछ बोले,मुंह खोले तो केस-मुक़दमा,जेल में ठूंस दिये जायेंगे.फासीवाद के खिलाफ़ लड़ाई ही ख़त्म हो गयी.

गलती से नागरिकता क़ानून को छेड़ दिया गया और यहीं से पांसा पलट गया.शाहीनबाग़ जाम हो गया, जामिया की बेटियां सीना तान खड़ी हो गयीं.अपराजय भाजपा बैकफ़ुट पर आ गयी. लड़ाई तेज़ हुई, देश भर में आंदोलन का माहौल बना तब कथित धर्मनिरपेक्ष दलों के  नेता बिल से बाहर निकलने लगे. बिहार में माले ही अकेले ज़मीन पर लड़ती दिखी. देश भर में बहुत सारे एक्टिविस्ट, पत्रकार, बुद्धिजीवी भी फासीवाद के विरुद्ध लड़ाई में अगुआ रहे हैं. हम यहां कथित धर्मनिरपेक्ष दलों की बात कर रहे कि अपनी राजनीतिक लाभ के लिए कैसे मुसलमानों को भाजपा का व्यक्तिगत दुश्मन बना दिया.अयोध्या फैसला से लेकर तीन तलाक़ और सीएए,एनआरसी की लड़ाई में ये कहीं नहीं दिखे. क्या ये मुद्दे मुसलमानों के हैं?यदि हैं भी तो मुसलमान इस देश के नागरिक नहीं हैं ? उनकी लड़ाई में आपको फ़्रंट पर क्यों नहीं रहना चाहिये ? क्या ये मुद्दे भारत की साझी विरासत, संविधान,सेक्युलरिज़्म की अवधारणा, लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट नहीं पहुंचाता ? दरअसल,हिंदू-मुस्लिम से सिर्फ भाजपा को ही लाभ नहीं है, सेक्युलर दल भी ऐसा ही गोलबंदी चाहते हैं. ताकि,डर से मुसलमान उन्हें वोट करते रहें और हम इतने ख़ूनखार हो गये हैं कि विचारधारा से लड़ने की बजाय सत्ता से लड़ बैठे हैं और वो शादी-ब्याह में एक दूसरे के घर जाते हैं और सत्ता से अपना काम भी निकलवा लेते हैं.

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