Wednesday, November 18, 2020

भारत विश्व भर में लोकतंत्र की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रही है और बिहार उसका उदगम स्थल : डॉ विजय रंजन

 नए निज़ाम का इस्तकबाल हो। बहुतेरे जो जीते हैं, बेशक इस जनता का चयन नहीं ..वरन् सिर्फ मतदान के अपने अधिकार को बनाए रखने की मजबूरी है।



लोकतंत्र की पाठशाला और कार्यशाला का सबसे बेहतरीन सफ़र तय करते हुए ही बिहार विधानसभा चुनाव संपन्न हुआ है। नई उम्मीद और नई उड़ान भरने वाले वोटरों को स्वयं से संघर्षरत देखा गया है। उम्मीद और डर के साये में जिस लोकतंत्र की प्रक्रिया शुरू और समाप्त हुई वह लोकतंत्र बिहार की धरती से उपजी वैशाली का नहीं हो सकता हैं। लेकिन लोकतंत्र के एक नए स्वरूप में परिवर्तन कि एक नई दिशा देने में दो कदम और आगे बढ़ गई। इसी संबंध में जन चेतना क्रांति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ विजय रंजन ने अपने अंदाज में कुछ अभिव्यक्ति साझा किए। नई सोच़ के साथ नई क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए तैयार डॉ विजय रंजन 16 अक्टूबर को अपनी नई राजनीतिक दल का निबंधन प्राप्त कर चुके हैं। चुनाव की 80% प्रक्रिया समाप्त हो जाने के बाद चुनाव आयोग ने राजनीतिक मान्यता दी। लेकिन अपने इरादे और विचारों से प्रभावित करने के लिए जनमानस के साथ एक संवाद कार्यक्रम करने का इरादा रखते हैं।


भारत विश्व भर में लोकतंत्र की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रही है और बिहार उसका उदगम स्थल...‼️ ये साल 2020 और बिहार कोरोना जाल से निकलते हुए नवयुग में प्रवेश किया ..... शानदार जानदार मुखिया, महान समाज सेवक टाइप उपमुखिया द्वारा और योग्यता के चरम टाइप मंत्री गण के भरोसे नवबिहार में प्रवेश के लिए महान बिहार के नीति नियन्ताओं को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। ... 

पक्का अब हम इस पंचवर्षीय (.?) में जल्द ही अपने देश के टॉप पे होंगें। ....और आशान्वित बिहार के इस चुनाव के साथ विश्व की एक बहुत बड़ी आबादी राजनीतिक शिक्षा का एक पाठ पूरा कर रही है । भले हमारी विधानसभाओं और संसद में कुछेक अपराधियों एवं भ्रष्टाचारियों के "गिरोह" पंहुच रहे हो। चुने हुए नेताओं द्वारा राष्ट्र को लूटा और अपमानित किया जा रहा हो। टिकट से लेकर प्रधान बनने के सफ़र में तमाम तरह के काले व उजले लेन-देन और जाति धर्म के गणित.. योग्यता का पैमाना हो।

परंतु भीतर ही भीतर एक प्रक्रिया जारी सी दिख रही है । यह प्रक्रिया जनता के मनोवैज्ञानिक सशक्तिकरण की है । .. यह जनता आज भले ही जाति, धर्म, क्षेत्र या किन्हीं झूठे-नकली मुद्दों पर मत दे रही हो, पर इसी जनता के बीच से एक नई पीढ़ी का उदय हो रहा है।  ..आशा की यह इबारत अभी बहुत धुंधले अक्षरों में लिखी है। ..पर यह दशकों पुरानी तरह की राजनीति का आखिरी दशक है। ...इस राजनीति के बने रहने के सारे आधार, तर्क और कारण खत्म होते नजर आ रहे हैं। निहित स्वार्थ वाले नेताओं और दलों की जगह अब नए सामूहिक नेतृत्व के उभरने का ऐतिहासिक समय नजदीक आ चुका है। मतदाताओं की अगली पीढ़ी इस नई राजनीति पर अपनी मुहर लगाने के लिए तैयारी के अंतिम चरणों में है।

बिहार चुनाव में सत्ता चाहे जिन्हें मिली हो और वे क्या करेंगें, इससे ज्यादा महत्व की बात यह है कि लोकतंत्र की पाठशाला में बिहार की जनता ने एक पाठ और पूरा किया। ..इसके विजेता तो अभी नेपथ्य में हैं और दशक बीतते-बीतते वे चारों दिशाओं से आते दिखेंगें!!

       रोज हम एक अँधेरी धुन्ध के पार..
           काफ़िले  रौशनी  के देखते हैं ...🙏

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