Wednesday, November 18, 2020

लोकतंत्र में अब लोगों की आस्था की जरूरत नहीं है, चुनाव ख़त्म हो चुका है : जनता सरकार

 

बिहार में चुनाव खत्म होने के साथ ही लोकतंत्र की मर्यादा और उसकी प्रतिष्ठा की बातें खत्म हो चुकी है। चुनाव खत्म तो लोकतंत्र भी खत्म और लोकतंत्र खत्म तो भारतीय संविधान की महत्ता भी खत्म हो जाती है। यही आज मूल बिंदु है, भारत का कि भारत के सर्वोच्च पदों पर बैठे हुए माननीय, संविधान में आस्था नहीं रखते हैं। सर्व विदित है कि बिहार में चुनाव यह कोरोना महामारी के बाद की पहली बड़ी चुनाव रही है और इस चुनाव में देश के चुनावी स्टार प्रचारक नरेंद्र मोदी की भूमिका देखकर यह कहीं से नहीं लगा कि देश के प्रधानमंत्री वही हैं, जिन्होंने एक कोरोना मरीज होने पर पुरे देश में लॉकडाउन लगाकर 130 करोड़ आबादी को घरों में बैठा दिया था। यह कहीं से नहीं लगा कि कोरोनावायरस मुक्त बनाने की तरफ भारत के प्रधानमंत्री की कोई आस्था भी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरीके से चुनावी अखाड़े में उतरते हैं, यह स्पष्ट है कि वहां पर नियमावली ताक पर रख दी जाती है। क्योंकि भारत में चुनाव आयोग जो वर्तमान में काम कर रही है वह स्पष्ट रूप से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुलामी में जकड़े हुए बंधुआ मजदूर की तरह नजर आते हैं। 

ज्ञात हो कि मार्च महीने में ताली, थाली और दीया, बाती के साथ टाॅर्च और मोमबत्ती दिखाने के बाद जब करोना महामारी का ढ़ोंग नहीं चल पाया, तो संपूर्ण भारत में लाॅकडाउन का खेल खेला गया। एक सामान्य सी बात है कि जब सर्दी का मौसम खत्म होता है वैसे ही आम लोगों में सर्दी बुखार जैसी बीमारियों का आगमन हो जाता है वैसा ही मार्च में शुरू हुआ। प्रधानमंत्री जिस तरीके से लगातार अपने बातों को ही बदलते रहे तो इसका सिर्फ एक ही रीजन था कि झूठ बोलने की सारी हदें कैसे पार की जाए उसका एक रिकॉर्ड बनाने का भी एक सुनहरा अवसर था। लोगों को इतना डरा दिया गया की आपस में पति-पत्नी, भाई-बहन, माता-पिता भी एक दूसरे के साथ तो दूर की बात थी, पड़ोसी तक से रिश्ते भी खत्म कर दिए गए। भारत रिश्तो का देश रहा है और एकजुट होकर समाज निर्माण में हमेशा भागीदारी निभाने वाला भारत कोरोना काल में अलग-थलग पड़ा नजर आया। देश का नेतृत्वकर्ता इस तरीके का नहीं होना चाहिए कि वह अपने ही लोगों को जिन्होंने टैक्स देकर साथ ही साथ पूरी शक्ति देकर राष्ट्र एवं आम जनमानस के हित के लिए प्रधानमंत्री के रूप में बैठाया हो। देश की शांति और समृद्धि मानवता रूपी एक विशाल वटवृक्ष के नीचे हैं फल फूल सकता है। 


हम बात कर रहे हैं लोकतंत्र की और चुनाव की। अगर वाकई में एक वैश्विक महामारी के रूप में कोरोनावायरस पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले चुका था। जहां लोगों के एक दूसरे से जुड़ने से बीमारी फैल रही थी, वही जब-जब इस देश में बीच में चुनाव नजर आया वैश्विक महामारी और करोना कहीं नजर नहीं आया। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जितना विश्व को घूम घूम कर जानने और समझने का प्रयास किए उससे कहीं ज्यादा भारत की प्रतिष्ठा का हनन करने में साथ ही साथ भारतीयों के जीवन शैली को भी ध्वस्त करने में महत्ती भूमिका निभाई। यह विचार करने की चीज है कि भारत का प्रधानमंत्री जिसे अवसर मिला है यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का नेतृत्व करें वह झूठा नहीं हो सकता है। लेकिन भारत का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उठाए गए सारे कदम अगर वैश्विक महामारी कोरोना काल में सही था तो वर्तमान में करोड़ों की संख्या में कोरोनावायरस के शिकार भारत में है उस समय चुनाव प्रचार या चुनाव कराना कितना बड़ा संकट पैदा करने के बराबर है। 

यह भारत की जनता को समझना होगा किस देश को चलाने के लिए झूठे जुमले से ज्यादा जरूरत है एक ऐसे नेतृत्वकर्ता कि जो मातृभूमि को दिल से मां समझ सके। राजनीति दूसरों के लिए होती है देश के लिए धर्म होता है। लेकिन जहां धर्म और संस्कृति विनाश की ओर जाता हो और भारत का प्रधानमंत्री सारे हथकंडे अपनाते हो झूठ, फरेब और जुमले के सहारे, तो वैसे राष्ट्र का निर्माण शुभ संकेत की तरफ नहीं ले जाएगा। पिछले कई दशकों से या यूं कहा जाए तो आजादी के बाद से ही भारत के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का प्रयास भारत सरकार करती रही। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि आजादी के 74 सालों बाद भी हम पहुंचने का ही प्रयास कर रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री अभी डिजिटल भारत की ही बात कर रहे हैं और डिजिटल दुनिया से पूर्ण रूपेण आम लोगों को दूर रखा हुआ है। डिजिटल भारत का सपना भाषणों की जगह आदतों में लाने से होगी। इसलिए आवश्यक है कि भारत के प्रधानमंत्री पद पर वैसे ही व्यक्ति का पदार्पण हो जिसे मानवता का ज्ञान हो। भारत का प्रधानमंत्री पद मानवीय मूल्यों का सबसे बड़ा सिद्धांतिक पद है और इसके लिए आवश्यक है कि पारिवारिक जीवन के साथ सामाजिक जीवन का भी अनुभव हो। उस व्यक्ति के हाथ में राष्ट्र की बागडोर नहीं होनी चाहिए, जिसे ना तो परिवार, समाज, धर्म, संस्कृति, संस्कार के साथ-साथ मानवता के गुण ना हो।

बिहार विधानसभा चुनाव के समाप्ति के साथ ही यह समाप्त हो चुका है कि आप आप स्वतंत्र हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झूठ के सहारे इस देश को चलाने के फिराक में है। चुनाव की समाप्ति के साथ ही कोरोना के रेश्यो बढ़ने लगे हैं और अब पुनः टेलीविजन के माध्यम से और सोशल साइट्स के माध्यम से डराने का खेल शुरू हो गया है। अगला चुनाव पश्चिम बंगाल में है और बिहार में भी पंचायती राज चुनाव है। इसी प्रकार से विभिन्न राज्य में पंचायती राज चुनाव भी हैं। जैसे उत्तर प्रदेश जहां योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्हें राष्ट्रवादी कहा जाता है, लेकिन मानवतावादी गुण कहीं से नजर नहीं आते है। 


जब दुर्भाग्य है कि सारी क्षमता के होते हुए भी और सारी सकारात्मक विचारों के संकलन होने के बावजूद भी भारत का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को झूठ का सहारा लेना पड़ता है। चुनाव अगर ठीक है और चुनाव की तैयारी भी ठीक है तो जानिए आप भी ठीक हैं और बेहतर निर्माण की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हैं।

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